Friday, July 13, 2018

सब्र और समझ

छोटे से गांव के एक क़स्बे में बाप अपने बेटे को डांट रहा था
"आ गओ ठाकुर के छोरे से लड़के"
गुस्से से तमतमाया बाप पास रखे लोटे से पानी गटक गटक के अपने बेटे को डांट रहा था।
"का जरूरत थी लड़न की अगर उनने कछु कह भी दओ हो तो"
"बाबूजी वो आपखे हरा...."
"चुप बिल्कुल चुपई बैठ। कहन दे उके कहने से  हो थोड़ी न हो जाहै तेरो बाप हरामी। अब कल से वो तेहे काम नहीं देहे पहले से ही कर्जा है तेरे बाप के सर पे दिखत नहीं है का।"
ब्रजेश की आवाज़ ऊंची हुई
"चुका तो रहें हैं एक टैम की रोटी खा रहे अगले 2 बरस से। अब चुका देंहै इतनो ब्याज लगाओ है थोड़ो सबर तो कर ही सकत है"
और ये कहते हुए अपने घर से निकल गया।
उसके बाबूजी ने फिर पानी गटका और सोने चले गए।
सुबह ब्रजेश ठाकुर के घर गया उसने मिन्नतें कि पर उसकी सारी मिन्नतें ठाकुर नजरअंदाज करते रहा।
ब्रजेश से पिटा ठाकुर के बेटे से भी ब्रजेश ने मिन्नतें की कि काम मे रख लो पैर पड़े पर उसे भी रत्ती भर का फर्क न पड़ा।
अब उसके पास सिर्फ एक रास्ता बचा था ठाकुर को मनाने का , वो मंदिर जाती ठकुराइन के पैरों में गिर गया और काम की मिन्नतें मांगने लगा उसने अपना गमछा ठकुराइन के पैरों में रखते हुए
बोला
"मालकिन इस अभागे से गलती हो गयी चाहो तो मार लेयो दो चार लात पर काम देई दो"
छोटे कस्बों में अक्सर पगड़ी गमछा अपनी इज्जत के रूप में रख देतें हैं।
ठकुराइन पर असर नहीं पड़ा वो उसकी बेटी की तरफ मुड़ा और बहनजी कहते हुए उसके कदमों में भी गिर गया। नारी देवी तुल्य होती है उसके कदमों में गिरना वैसे ही पुण्य होता है उसके बाबूजी ने समझाया था कि नारी की हमेशा इज्जत करना जिसे बहन बोलना उसे पूजना भी।
परंतु यंहा उसके गिड़गिड़ाने पे किसी को फर्क नहीं पड़ा।
         अब उसे कमाना है तो गांव से दूर शहर जाना होगा जो वो चाहता नहीं था। पर अब मजबूरी बन गयी थी शहर जाना। दूसरे दिन उसका बोरिया बिस्तर बांध दिया गया। शहर में उसके मामा काम करते थे वो उन्ही से जाकर मिला। उसके मामा ने उसे बताया "गांव में तुम 200 रुपये दिन की मजदूरी में काम करते थे यंहा तुम्हें 300 मिलेंगे पर यंहा कोई ठाकुर नहीं जिसके पास जाके काम मांगो। आगे चौराहा है वँहा सभी मजदूर खड़े रहते हैं तुम्हें भी वहीं जाकर खड़े होना है कोई आएगा काम देने तो उसके साथ गाड़ी में बैठ के जाओ और वो वापस तुम्हें वहीं छोड़ देगा"

ब्रजेश को सुनने में जितना सरल लगा था वो उतना ही जटिल था दूसरे दिन वो चौराहे में खड़ा हो गया। लोग मजदूर लेने आते उनपर सारे मजदूर टूट पड़ते की हम चलेंगे हम चलेंगे और वो लोग उसके आस पास जुटी 20-30 लोगो की भीड़ में से 2 मजदूर को उठाके ले जाते। ब्रजेश से ये सब नही हो सका वो बस बैठा रहता शायद उसे उम्मीद थी कि ठाकुर के आदमी जैसा कोई आएगा और कहेगा
"अबे चल धान रोपने है"
और वो रोटी का डब्बा उठाएगा और निकल पड़ेगा।
तीन दिन ब्रजेश ने रोटी चौराहे में बैठ के ही खाई अब वो परेशान होने लगा था। पास पैसे बचे नहीं थे और न मामा अंबानी।भेजने को क्या उसके पास अब खाने के पैसो का इंतजाम नहीं हो रहा था। चौथे दिन भी उसको कोई काम नहीं मिला वो बाकि दिनों जैसा ही चौराहे में बैठ के रोटी खाया पर शाम को घर नहीं गया बस चौराहे में ही आती जाती गाड़ियों को घूरता रहा।
रात हुई सारी दुकानें बंद होने लगी थी। 10 बज रहे थे अब वो इस बड़ी सड़क में अकेला घर की और बढ़ रहा था। उसके दिमाग मे सिर्फ पैसे चल रहे थे। उसे सामने से आती हुई एक लड़की दिखी अचानक उसकी नजरों में एक तेज आया और वो उसके नजदीक आते ही उसके पर्स में टूट पड़ा लड़की चीखी और पर्स को मजबूती से पकड़ लिया। ब्रजेश का दिल तेजी से धड़क रहा था उसे डर नहीं बस पैसे पाने की ललक थी।लड़की ज्यादा देर ब्रजेश के मजदूर हाथों से नहीं लड़ सकी और सड़क में गिर के बैठ गयी।
वो चीख़ रही थी
"प्लीज भैय्या छोड़ दो मुझें"
भैय्या शब्द सुनके उसके रोंगटे खड़े हो गए।उसके सामने उसके बाबूजी की तस्वीर तैरने लगी।
थक के बैठ चुकी लड़की की चीख सुनकर अब ब्रजेश पर असर होने लगा था। उसका शरीर ठंडा पड़ते जा रहा था अब वो डर के मारे घबराने लगा था। उसने झट से गर्दन पर लिपटा गमछा निकाला और लड़की के पैरों पर रख कर बोला
"बहनजी माफ़ कर देयो बहुत बड़ो पाप करन जात तो मैं"
और राम राम बड़बड़ाते हुए
घर की और भाग खड़ा हुआ....

Wednesday, June 6, 2018

मिहरिमह (moon light)

अमावस्या की रात थी, घनघोर वर्षा हो रही थी एक छोटे  से कस्बे में पूरा मोहल्ला कानाफूसी में लगा था।
तभी एक घर के अंदर से खबर आई कि शायद होने वाला शिशु जिंदा न बच पाए।
मोहल्ले के लोगों में कानाफूसी बढ़ गयी।
लोग अल्लहा से मिन्नतें कर रहें थे कि वो बच जाए।
तभी अंदर से एक अच्छी खबर आई,
बच्ची हुई थी वो भी सही सलामत।
कुछ देर की शांति के बाद फिर मोहल्ले के लोगों में कानाफूसी शुरू होती है ।ये मोहम्मद आमिर की तीसरी बेटी थी इससे पहले उनकी दो बेटी औऱ 5 और 3 साल की थी।
मोहम्मद आमिर अपनी दोनों बेटियों से बेहद प्यार करते थे, पर पुत्रमोह से भी ग्रसित थे..!

आज वो करिश्मा हुआ है जो होना मुश्किल था, लग रहा था होने वाला शिशु इस अमावस्या की रात के अंधेरे में ही गुम जाएगा, पर वो जन्मा चमकते हुए बिल्कुल चांद सा।
मोहम्मद आमिर ने अपनी बेटी का नाम मिहरिमह रखा जिसका मतलब चांदनी, चांद का प्रकाश होता है।
मिहरिमह घर मे छोटी थी पर सबसे छोटी बस वो ढाई साल ही रह पायी फिर उसका भाई आ गया जिसका इंतजार उसके अम्मी अब्बू को काफी अर्से से था।
वक्त जल्दी जल्दी बीत रहा था
मिहरिमह अब 8 साल की हो गई थी, थोड़ी समझदार भी।
मिहरिमाह के अब्बू उसे स्कूल भेजते थे, उस छोटे कस्बे में बच्चियों को बस घर के काम करने सिखाये जाते थे उसकी दोनों बहनें भी कभी स्कूल नहीं गई थी।
तब मास्टर उस एकलौती लड़की को स्कूल में आते देख थोड़ा अचंभित होता था।
उसे एक तरफ दूर बैठाया जाता  और उससे न सवाल पूछा जाता न उसका होमवर्क देखा जाता।
एक दिन वो मास्टर से लड़ ली
"मासाब आप हमें पढ़ाते क्यों नहीं , हम तो इन सबसे भी होशियार हैं जिन्हें लिखना नहीं आता उन्हें शाबासी देते हो हमें क्यों नहीं?!
मासूमियत और रोष से पुछे गए सवाल को उस मास्टर ने नजरअंदाज कर दिया।
ये देख के मिहरिमह को और गुस्सा आया और वो मास्टर के सामने खड़े हो गई और होमवर्क चेक करवाने की ज़िद करने लगी।
उस छोटी बच्ची के सवाल पूछने और तेज आवाज में बात करने को लेकर मास्टर को गुस्सा आया और उसने मिहरिमह की कॉपी लेकर उसमें 1 से 1000 तक कि गिनती लिखके लाने को कहा और साथ में ये भी कहा कि
"अगर ये नहीं हुआ तो कल से मत आना"

मिहरिमह ज़िद में बात मान गई और घर चली आयी।
अब्बा को सारी बात बताके कहा कि मुझें शाबासी चाहिए और स्कूल की सारी बातें अपने अब्बा को बता दी। ये सब सुनने के बाद उसके अब्बा बोले
"मिहरिमह जो तुझें नहीं मिल सकता उसके पीछे ही क्यों भागती है"

मिहरिमाह बस इतना बोली
"मुझें तो जिंदगी भी नहीं मिलने वाली थी पर मिल गई ना"

छोटी बच्ची का करारा जबाब सुन के मोहम्मद आमिर स्तब्ध हो गए
और उन्होंने ने रात भर उसके साथ जाग के 1 से 1000 तक गिनती लिखवाई और सुबह मिहरिमाह ने शाबासी भी पाई।

वक्त बीता
मिहरिमह अब 12 वीं भी पास कर गई थी इसके बाद कि पढ़ाई करवाने की उसके अब्बू की न हैसियत थी न ही मर्ज़ी
अपनी दो बेटीयों की शादी एक साथ करवा चुके मोहम्मद आमिर एक दो साल बाद आयसा की भी शादी करवाना चाहते थे पर मिहरिमह के सपने तो कुछ और ही थे।
उसकी अम्मी उसे बार बार कहती "मिहरिमह जो तुझें नहीं मिल सकता उसके पीछे ही क्यों भागती है"

पर मिहरिमह अम्मी कि बात नजरअंदाज कर देती थी 

और कहती थी
"अम्मी  मेरे नाम का मतलब पता है तुम्हें, बस वैसे ही चमकना है मुझें"
मिहरिमह को फिल्मों में जाना था
वो मोहल्ले में और स्कूल में अपनी सहेलियों के सामने  एक्टिंग करती और उन सबकी तालियां बटोरती और खुशी से नाचती थी।
तारीफों से उसकी आंखों में एक अलग चमक दिखती थी।

इसी बीच मिहरिमह की जिंदगी में एक हादसा हुआ उसके अब्बू
मोहम्मद आमिर एक्सीडेंट के शिकार हो गए थे, बुरे तरह से ज़ख्मी आमिर को अस्पताल ले जाया गया। ऊपरी इलाज के बाद डॉक्टर ने मोहम्मद आमिर कि पत्नी को बताया कि इनका ऑपरेशन करना पड़ेगा जिसका कुल खर्च एक लाख आएगा।
तब तक उनकी दोनों बेटियां भी आ गई थी।
मोहम्मद आमिर की पत्नी और दोनों दामाद ने खर्चे को लेकर चर्चा कर कुछ तय कर लिया था जिससे मिहरिमह अनजान थी।
इसी बीच उसकी अम्मी ने उसका परिचय उसके दूर के मामू से करवाया जिन्हें उसने पहले कभी नहीं देखा था।मिहरिमह की अम्मी ने उससे कहा
"ये इख्तियार मामू हैं मुंबई में रहते हैं, फिल्मों में लोगो को काम भी दिलाते हैं, तुम्हें फिल्मों में जाना है न इनके साथ मुंबई चली जाओ"

इतना सुनते ही मिहरिमह चमक उठी पर कुछ देर बाद ही वो बोली
"पर अब्बा...."
मिहरिमह की माँ उसकी बात काटते हुए बोली
"अब्बा की फिक्र मत करो उनका ऑपरेशन होने वाला है वे ठीक हो जाएंगे मगर ये मौका तुमसे छुटा तो दोबारा नहीं मिलेगा"

अम्मी की बात मान के मिहरिमह जाने के लिए तैयार हो गयी
उसे फिर वही मिल रहा था जिसे सब कहते थे नहीं मिल सकता।
उसे खुशी थी कि
उसने सबको गलत साबित करके जिंदगी ली, शाबासी ली और बहुत कुछ अब एक और मंजिल वो हासिल करने वाली थी।
सब से विदा लेकर वो अपने नए नवेले मामा के साथ मुंबई आ गई।

मुंबई में उतरते ही उसके चेहरे की चमक उसके नाम सी बढ़ गई ।
बड़ी बड़ी बिल्डिंग इतनी भीड़ भाड़ सब कुछ उसके लिए नया था।
रेलवे स्टेशन से निकलते ही उसके मामा उसको लेकर
एक मोहल्ले में ले गए। वो बस बड़े शहर के नज़ारे देखते हुए  उनके साथ चल रही थी।

उस मोहल्ले में जाते ही उसने मामा से पूछा
"मामू हम ये कंहा आ गए"

मामू ने एक कुटिल मुस्कान चेहरे पर लाते हुये कहा

"वहीं जंहा तुम्हें अपनी कला दिखानी है"

मिहरिमह मुँह बनाते हुए बोली
"ये फ़िल्म इंडस्ट्री हैं, यंहा बनती हैं क्या फिल्में"

उसके मामू ने कुछ जबाब नहीं दिया
बस चेहरे पर एक मुस्कान लिए हुए चलते रहे।

मिहरिमह तुंरत में कुछ नहीं समझ पाई पर जैसे जैसे मोहल्ले की गहराई में जाती रही सब कुछ  समझती रही।
वो गलत हाथों में आ गई थी, उसे अब समझ आ रहा था कि उसके अब्बू के इलाज के पैसे कंहा से आये और ये नये नवेले मामू उसे कंहा और किस लिए लेकर आये हैं...

उसके रोंगटे खड़े हो गई वो उसके मामू की उल्टी दिशा में तेजी से भागी पर उनके साथियों के हाथ कुछ देर में ही पकड़ी गई।
"कर ली कोशिश, हो गई तसल्ली चलो अब चुपचाप मैरे पीछे पीछे आओ" इख़्तियार ने कहा ।
अब उसके पास सिर्फ एक ही रास्ता था जो कि उसके मामू के पीछे पीछे जाता था, वो बहुत दूर निकल के आ गई थी जंहा से उसका वापिस जाना नामुमकिन था।
वो सहती रही और कोशिश भी करती रही वँहा से निकलने की पर हर बार असफल रही।

एक दिन उसके "परमानेंट ग्राहक" ने उससे पूछा
"बोल मिहरिमह तुझें क्या चाहिए"

मिहरिमह बोली
"मौत"

उसके कानों में एक आवाज़ गूंजी
"मिहरिमह जो तुझें नहीं मिल सकता उसके पीछे ही क्यों भागती है"
उसे अब खुद के नाम से घृणा होने लगी थी। वो सोचते रहती थी काश जन्म के समय ही अमावस्या के अंधेरे में वो समा जाती।
जिंदगी उसकी अब उसके नाम के उलट जो हो गई थी.....

Monday, January 8, 2018

मोहब्बत

रात के 3 बज रहें थे, शहर के इकलौते बड़े अस्पताल के ICU वार्ड में ICU की बाहर वाली बेंच में बैठी एक लड़की फफक फफक के रो रही थी। उसे सहलाने के लिए वँहा कोई मौजूद भी नही था..! राहुल उसके सामने वाली बेंच में चुपचाप बैठा था। उसके दादा ICU में भर्ती थे । वो घर मे सबसे ज्यादा प्यार अपने दादाजी से ही करता था जो अभी ICU में भर्ती थे । हॉस्पिटल में आज रुकने की उसकी ड्यूटी थी।
        रोने वाली लड़की का नाम आरुषि था। दो नर्सो के आपस मे बात करने से उसे पता चला था कि उसका भाई ICU में भर्ती था ।जिसका एक्सीडेंट तेज बाइक चलाने से हुआ था।
         आज राहुल को पता चला था कि लड़कों का दिल ज़्यादा कठोर होता है। वो आँसू दिल मे ही बहा लेते है आंखों तक आने नही देतें ।
वो हॉस्पिटल की कैंटीन से दो कप चाय लेके आया और आरुषि के पास बैठ गया और उसे रुमाल देते हुए चाय ऑफर कि।
आरुषि अपनी रुमाल दिखाते हुए बोली~
"में चाय नही कॉफी पीती हूँ"

राहुल उठा और एक बार और केंटीन जाके उसके लिए कॉफ़ी ले आया और उसे दे दी।
आरुषि ने एक शिप मारते हुए कहां
"इन्हें कॉफी बनानी नही आती क्या इतनी मीठी करदी है"

राहुल हैरान था...
2 मिनिट पहले जिस लड़की के मुँह से एक शब्द पूरा निकलना दुसवार था वो अब कॉफी का टेस्ट जज कर रही थीं।

राहुल कुछ बोलता इतने में ही आरुषि बोल उठी
"तुम्हारा यंहा कौन भर्ती है?"
"दादाजी"
राहुल बजह बताता इससे पहले आरुषि बोल पड़ी
"बुज़ुर्ग हो गए होंगे न वो तो बहुत"
राहुल अपनी जुबां तक आये शब्द वापस करके बोला
"हां 78 साल के हैं"
राहुल ने औपचारिकता निभाते हुए बोला
"तुम्हारा यंहा कौन भर्ती है?"
आरुषि ने बिना उसके तरफ देखे बोला
"भाई"
राहुल बजह जानने के लिए बोला
"उसे क्या...."
राहुल की बात को अनसुना करते हुए आरुषि बोलने लगी
"भाई नही जिंदगी है वो मेरी, पूरी लाइफ में सिर्फ एक ही तो दोस्त बना है मेरा वो है मेरा भाई, अभी भी मेने उसे मेरे बर्थडे में गिफ्ट लाने को कहां था । उसी के लिए पैसे इकठ्ठे कर रहा था।"
राहुल बीच मे बोला
"तो"
इस बार आरुषि दांत पीसते हुए बोली
"कुछ कमी हो गई तो निकल गए जनाब रेस लगाने।"
शायद उसे खुद पे या अपने भाई पे गुस्सा आ रही थी।
राहुल बोला
"ओह ज्यादा तेज गाड़ी चलाने के कारण एक्सीडेंट हो गया"
आरुषि थोड़ी देर चुप रहीं फिर बोलना शुरू किया
"पता है जब उसे हॉस्पिटल लाये तब उसने मुझसे कहां था कि तू ये बात मत बताना की में तेरे गिफ्ट के लिए पैसे इकठ्ठे कर रहा था। नही तो पापा तुझे डांटेंगे"
इतना कहते कहते आरुषि फिर फफक फफक के रोने लगी।

राहुल को नही आता था सहलाना कैसे है तो वो बोला
"तुम्हारा भाई ठीक हो जाएगा"
इस बार आरुषि ने उसकी तरफ देखा और कंहा
"उसे ठीक होना ही पड़ेगा"
राहुल उसकी रोती आंखों में अचानक से तेज देख के  बोला
"मतलब वो जल्दी ठीक हो जाएगा"

हॉस्पिटल में 10 दिन हो चुके थे , राहुल के दादा दो दिन पहले ही डिस्चार्ज होके घर चले गए थे । आज आरुषि का भाई  डिस्चार्ज हो रहा था इसलिए वो उसके लिए गुलदस्ता लाया था।
इन पन्द्रह दिनों में बहुत कुछ हुआ आरुषि उसकी अच्छी दोस्त बन गई थी और उसके भाई को जबसे होश आया था वो तीनो बहुत देर तक बात करतें रहते ।
       आरुषि के भाई के रूम में दाखिल होते ही उसने आरुषि और उसके भाई आरव को देखा और अपने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए गुलदस्ता उसके आगे बढ़ाते हुए बोला
"ये तुम्हारे लिए"
आरव शरारती अंदाज में बोला
"मेरे लिए लाए या इसके लिए"
आरुषि खिलखिला के हँस पड़ी और राहुल झेंप गया।
    इतने दिन साथ रहने के बाद भी वो आरुषि को समझ नही पाया था। उसे अब भी समझ नही आता कि वो गुस्सा दिखाते दिखाते अचानक से हंसी मजाक क्यों करने लगती है, हँसते हँसते अचानक से शांत हो जाती है जैसे थोड़ी देर पहले क्या वो कभी जिंदगी में हँसी ही न हो।
राहुल आरुषि के परिवार को अच्छे से जानने लगे था। उसके घर मे दादी थी जो आरव से बहुत प्यार करती थी और पापा थे जिनकी आरुषि परी थी। एक माँ भी थी जिनके बारे में राहुल ने बस सुना था न कभी तस्वीर में देखा न हॉस्पिटल में....
शायद सौतेली माँ थी, उनके बारे में आरुषि ने कभी भी जिक्र नही किया या जिक्र करना जरूरी नही समझा...।
              आरव हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो चुका था। अब वो घर में आराम कर रहा था और आरुषि उसकी देखभाल । राहुल भी घर आके कॉलेज ट्यूशन में बिजी हो गया। पर वो इंतजार कर रहा था आरुषि के मैसेज का उसे उम्मीद थी कि आरुषि को उसकी याद हमेसा न सही कभी कभी तो आती ही होगी।
   वक्त बीता दिन से सप्ताह हो गए। राहुल का सब्र टूट चुका था आखिर कोई इतना सेल्फिश कैसे हो सकता है, आरुषि तो बिल्कुल भी नहीं।
उसने आरुषि से मिलने का फ़ैसला किया । बिना बताएं राहुल    आरुषि के घर के सामने खड़ा था।हाथों में गुलाब था जिसके पत्ते राहुल के हाथों मसल गए थे....आज वो आरुषि से कुछ कहने आया था शायद दिल की बात।उसे नही पता था आगे क्या होने वाला है उसने कंपकपाते हांथो  से डोरवेल बजाई। दरवाजा  लंगड़ाते हुए आये आरव ने खोला घर में कोई नही था आरव टीवी देख रहा था और आरुषि किचन में थी। राहुल के अंदर आते तक आरव आरुषि को बुला चुका था।
अब राहुल की मंजिल ठीक उसके सामने खड़ी थी।
      आरुषि उसे देख के मुस्कुरा रही थी और राहुल उसे देख के झेंप रहा था..।
हाल चाल पूछने के बाद राहुल ने आरुषि से पूछा
"कंहा थी इतने दिन मैसेज भी नही किया"
आरुषि ने टालने के अंदाज से कहा
"थोड़ा बिजी थी"
राहुल बेताब था वो नही चाहता था अब पूरा गुलाब का फूल उसके हाथों कुचला जाए इसलिए उसने देर न करतें हुए आरुषि की आंखों में आंखे डालते हुए कहा
- "आरुषि मोह्हबत हो गई है तुमसे, न मुझें नींद आ रही न ही खुद को ढूंढ पा रहा हूं बस तुमपे खो से गया हूं मैं"

आरुषि ने नजर हटाई और कहा
"राहुल ये कंहा पहुँच गए तुम, तुमसे दोस्ती मैने इसलिए कि क्योकि तुम अच्छे लगते हो पर इतने नही। तुमने साथ दिया मेरा जब में जूझ रही थी दर्द से, पर मुझें नही चाहिए तुम्हारा साथ जिंदगी भर का। तुमसे मदद इसलिए मांगती थी क्योंकि तुम करते थे मदद इसका मतलब ये नहीं कि मोहब्बत है मुझें तुमसे। तुम जानने लगे हो मुझें पर इसका मतलब ये नही की पूरा जान चुकें हो।
शायद तुमनें मेरी हंसी को प्यार समझ लिया.....पर में अपनी मम्मी को देख के भी हंसती हूं!!!"

   राहुल निःशब्द था । बोलने और सुनने के लिए अब कुछ बचा ही नहीं, गुलाब की अब पंखुड़ी भी फर्स में गिर चूंकि थी।

वो निकल गया घर से ये सोच के कि
"इश्क़ किया था मैंने, सपने भी सँजो लिए थे, बस उन सपनों को पूरा करने की उम्मीद जिससे लगाई थी उसने साथ न दिया।
इश्क़ अधूरा रह गया था उसका। वो पूरा कर सकती थीं पर कर न सकी। मैं अब अपने इश्क़ को पूरा करने के सपनें देखूंगा पर उसके साथ जो सपनें पूरा करने में साथ दे...........🧡

Friday, January 5, 2018

आख़िरी ख़त

इश्क़ किया था मैंने
हां तुमने भी किया था
सपने देखें थे मैंने
हां तुमने भी देखें थे
वादे किये थे मैंने
हां तुमने भी किये थे
पर वादे मैं निभा सकता था
पर तुम नही निभा सकीं
अपने इश्क़ को पूरा करना था मुझे
पर तुम पीछे हट गई
हां तुम भी चाहती थीं पर कर न सकी पर मैं कर सकता था अगर तुम्हारा साथ रहता तो....

मेरा इश्क़ अधूरा रह गया
तुम्हारा भी....
नही तुम तो उस इश्क़ को किसी और के साथ पूरा कर लोगी

मैं भी अपने इश्क़ को अधूरे नही रहने देना चाहता

मैं भी करूँगा इश्क फिर से पर उससे जिसके साथ मंजिल तक पहुँच जाऊँ..

पर अब किसी में खोने से पहले मुझे खुद में खोना है....

खुद को जीना है मुझें अब
तुम्हारे साथ रहतें मेंने बस तुम्हे जिया है..

अब मैं उसमें खोउंगा जो मुझमें खोये

मैं उसे जिऊंगा जो मुझें जिये...

मैं करूँगा फिर से किसी से वादे
पर उससे जो खुद भी वादे पूरे करने के लिए वादे करें।

हां आओगी याद तुम
आखिर अधूरी ही सही मोहब्बत हो तुम मेरी
पर तब जो मोहब्बत रहेंगी मेरी वो तुमसी नही होगी कतई नहीं....

अब मैं फिर से अपनी जिंदगी को रंगीन करूँगा
उसके साथ जो उजाड़े ना....

         हाँ करना है मुझें इश्क़ फिर से पर तुमसे नही...
तुम्हारा लौट आना मुमकिन नहीं पर मेरी जिंदगी में तुमसे बेहतर मोहब्बत का आना सम्भव है..

तुम वेवफ़ा नहीं पर तुमसे वफ़ा भी शिद्दत से नही निभाई गई

मजबूरियां थी तुम्हारी भी
पर हम मिलके उन्हें हल कर सकते थे...
तुमने मेरा साथ जरूरी न समझा
शायद तुम खुद को मेरे लायक नही समझतीं...
   तुम सही हो मुझें फिर से मिल जाएगा इश्क तुमसे बेहतर....उम्मीद नही यकीन है मुझें❤️

जिसे मैं चाहूंगा दुनिया से बढ़ कर और वो मुझें...

अब बस खोना है मुझें खुद में...
वो सब पाना है जो मुझे मेरे लिए पाना है..
खुद को जीना है मुझे...
अब मैं
किताबों को वक्त दे पाऊंगा जिनके लिए में अपने घर से दूर हूँ.....

खुद के पास आना है अब मुझें
खुद को पाने के लिए💐

Thursday, December 21, 2017

बारिश

बारिश जब भी आती है
मेरे दिल में भी बाढ़ ला देती है
बर्बादी का मंजर फिर दिखा देती है
इसी बारिश की तरह तुम भी
बरसती थी कभी मुझ पर
जब भी आती थी मेरे पास
बारिश की तरह ठंडक लाती थी
जैसे बारिश में फूल खिल उठते हे
वैसे में भी तुम्हारी मौजूदगी में खिल उठता था..
अब बस बारिश आती है तुम नही.....

आज़ादी

कोशिश सब करतें हैं उड़ने की,
पर कुछ परिंदे ही आज़ाद होते हैं।

रूढ़िवादियों की बेड़ियों में बंधना आसान नहीं,
उसके लिए खुद को मारना पड़ता हैं।

आसान नही जीना ख़ुद की शर्तों पे यंहा,
कई दफा अपनों से ही लड़ना पड़ता हैं।

ऐसे ही नही मिल जाती उड़ान पंछियो को,
उन्हें भी अपने पंख फड़फड़ाने पड़ते हैं।

Monday, December 18, 2017

मैं

बंदीसे थी,
में उड़ गया।
अंजाने में,
जुर्म कर गया।

वो सख़्त थे,
अनुशासन में।
में वही अंजाने,
में तोड़ गया।

अपनी शर्तों पे,
यंहा जीना अब
जुर्म हो गया।
में यही जुर्म,
बार-2 कर गया।

में अब,
रिस्तों से दूर,
सपनों के पास था।
बस यही
गुनाह हो गया,
में अपनी शर्तों पे जी गया।

सब्र और समझ

छोटे से गांव के एक क़स्बे में बाप अपने बेटे को डांट रहा था "आ गओ ठाकुर के छोरे से लड़के" गुस्से से तमतमाया बाप पास रखे लोटे से पान...