छोटे से गांव के एक क़स्बे में बाप अपने बेटे को डांट रहा था
"आ गओ ठाकुर के छोरे से लड़के"
गुस्से से तमतमाया बाप पास रखे लोटे से पानी गटक गटक के अपने बेटे को डांट रहा था।
"का जरूरत थी लड़न की अगर उनने कछु कह भी दओ हो तो"
"बाबूजी वो आपखे हरा...."
"चुप बिल्कुल चुपई बैठ। कहन दे उके कहने से हो थोड़ी न हो जाहै तेरो बाप हरामी। अब कल से वो तेहे काम नहीं देहे पहले से ही कर्जा है तेरे बाप के सर पे दिखत नहीं है का।"
ब्रजेश की आवाज़ ऊंची हुई
"चुका तो रहें हैं एक टैम की रोटी खा रहे अगले 2 बरस से। अब चुका देंहै इतनो ब्याज लगाओ है थोड़ो सबर तो कर ही सकत है"
और ये कहते हुए अपने घर से निकल गया।
उसके बाबूजी ने फिर पानी गटका और सोने चले गए।
सुबह ब्रजेश ठाकुर के घर गया उसने मिन्नतें कि पर उसकी सारी मिन्नतें ठाकुर नजरअंदाज करते रहा।
ब्रजेश से पिटा ठाकुर के बेटे से भी ब्रजेश ने मिन्नतें की कि काम मे रख लो पैर पड़े पर उसे भी रत्ती भर का फर्क न पड़ा।
अब उसके पास सिर्फ एक रास्ता बचा था ठाकुर को मनाने का , वो मंदिर जाती ठकुराइन के पैरों में गिर गया और काम की मिन्नतें मांगने लगा उसने अपना गमछा ठकुराइन के पैरों में रखते हुए
बोला
"मालकिन इस अभागे से गलती हो गयी चाहो तो मार लेयो दो चार लात पर काम देई दो"
छोटे कस्बों में अक्सर पगड़ी गमछा अपनी इज्जत के रूप में रख देतें हैं।
ठकुराइन पर असर नहीं पड़ा वो उसकी बेटी की तरफ मुड़ा और बहनजी कहते हुए उसके कदमों में भी गिर गया। नारी देवी तुल्य होती है उसके कदमों में गिरना वैसे ही पुण्य होता है उसके बाबूजी ने समझाया था कि नारी की हमेशा इज्जत करना जिसे बहन बोलना उसे पूजना भी।
परंतु यंहा उसके गिड़गिड़ाने पे किसी को फर्क नहीं पड़ा।
अब उसे कमाना है तो गांव से दूर शहर जाना होगा जो वो चाहता नहीं था। पर अब मजबूरी बन गयी थी शहर जाना। दूसरे दिन उसका बोरिया बिस्तर बांध दिया गया। शहर में उसके मामा काम करते थे वो उन्ही से जाकर मिला। उसके मामा ने उसे बताया "गांव में तुम 200 रुपये दिन की मजदूरी में काम करते थे यंहा तुम्हें 300 मिलेंगे पर यंहा कोई ठाकुर नहीं जिसके पास जाके काम मांगो। आगे चौराहा है वँहा सभी मजदूर खड़े रहते हैं तुम्हें भी वहीं जाकर खड़े होना है कोई आएगा काम देने तो उसके साथ गाड़ी में बैठ के जाओ और वो वापस तुम्हें वहीं छोड़ देगा"
ब्रजेश को सुनने में जितना सरल लगा था वो उतना ही जटिल था दूसरे दिन वो चौराहे में खड़ा हो गया। लोग मजदूर लेने आते उनपर सारे मजदूर टूट पड़ते की हम चलेंगे हम चलेंगे और वो लोग उसके आस पास जुटी 20-30 लोगो की भीड़ में से 2 मजदूर को उठाके ले जाते। ब्रजेश से ये सब नही हो सका वो बस बैठा रहता शायद उसे उम्मीद थी कि ठाकुर के आदमी जैसा कोई आएगा और कहेगा
"अबे चल धान रोपने है"
और वो रोटी का डब्बा उठाएगा और निकल पड़ेगा।
तीन दिन ब्रजेश ने रोटी चौराहे में बैठ के ही खाई अब वो परेशान होने लगा था। पास पैसे बचे नहीं थे और न मामा अंबानी।भेजने को क्या उसके पास अब खाने के पैसो का इंतजाम नहीं हो रहा था। चौथे दिन भी उसको कोई काम नहीं मिला वो बाकि दिनों जैसा ही चौराहे में बैठ के रोटी खाया पर शाम को घर नहीं गया बस चौराहे में ही आती जाती गाड़ियों को घूरता रहा।
रात हुई सारी दुकानें बंद होने लगी थी। 10 बज रहे थे अब वो इस बड़ी सड़क में अकेला घर की और बढ़ रहा था। उसके दिमाग मे सिर्फ पैसे चल रहे थे। उसे सामने से आती हुई एक लड़की दिखी अचानक उसकी नजरों में एक तेज आया और वो उसके नजदीक आते ही उसके पर्स में टूट पड़ा लड़की चीखी और पर्स को मजबूती से पकड़ लिया। ब्रजेश का दिल तेजी से धड़क रहा था उसे डर नहीं बस पैसे पाने की ललक थी।लड़की ज्यादा देर ब्रजेश के मजदूर हाथों से नहीं लड़ सकी और सड़क में गिर के बैठ गयी।
वो चीख़ रही थी
"प्लीज भैय्या छोड़ दो मुझें"
भैय्या शब्द सुनके उसके रोंगटे खड़े हो गए।उसके सामने उसके बाबूजी की तस्वीर तैरने लगी।
थक के बैठ चुकी लड़की की चीख सुनकर अब ब्रजेश पर असर होने लगा था। उसका शरीर ठंडा पड़ते जा रहा था अब वो डर के मारे घबराने लगा था। उसने झट से गर्दन पर लिपटा गमछा निकाला और लड़की के पैरों पर रख कर बोला
"बहनजी माफ़ कर देयो बहुत बड़ो पाप करन जात तो मैं"
और राम राम बड़बड़ाते हुए
घर की और भाग खड़ा हुआ....